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कान्हा की नगरी में पुनर्जन्म का किस्सा, ‘मनीष’ बनकर लौटा ‘मुख्तार’

कान्हा की नगरी में पुनर्जन्म का किस्सा, ‘मनीष’ बनकर लौटा ‘मुख्तार’

मथुरा। कान्हा की नगरी में पुनर्जन्म का एक मामला नौहझील के गांव पारसौली में देखने को मिला है। यहां एक दशक पहले 16 जुलाई 2008 को बाजना से लौटते हुए एक पहलवान की मौत हो गई थी। अब एक 10 साल का बालक यहां पहुंचा है और वह अपने आपको 'पहलवान मुख्तार सिंह' बता रहा है। 

आपको बता दें कि राजस्थान में डीग तहसील के गांव वरई (बंधा) निवासी 10 वर्षीय बालक मनीष ने न केवल खुद को पारसौली निवासी ‘पहलवान मुख्तार सिंह’ बताया बल्कि भीड़ में खड़ी एक महिला को अपनी ‘पत्नी’ के रूप में पहचानने का ‘दावा’ भी किया। ग्रामीणों को जब इसका पता चला तो उसे देखने के लिए वहां मजमा लग गया।

पारसौली निवासी मुख्तार सिंह चौधरी को अच्छे पहलवानों में गिना जाता था। 16 जुलाई 2008 को बाजना से लौटते समय रास्ते में अचानक हदयगति रुकने से उनकी मृत्यु हो गई थी। अब करीब 10 साल बाद वरई निवासी बहादुर सिंह गुर्जर का 10 वर्षीय बेटा परिजनों के साथ रविवार को बाजना के गांव पारसौली में चौधरी मुख्तार सिंह पहलवान के घर पहुंच गया। खुद को ‘मुख्तार सिंह’ बताते हुए वहां पुरानी बातें बताने लगा। उसकी बातें सुनकर परिजन अचंभित रह गए। बालक के साथ आए पिता बहादुर सिंह ने बताया कि मनीष पांच साल की उम्र से ही गांव पारसौली चलने की जिद करता था और खुद को ‘पहलवान मुख्तार सिंह चौधरी’ बताता था। मनीष ने अपने पिछले जन्म में रिश्ते की ‘बेटी’ को निकटवर्ती गांव में तब पहचान लिया जब उसी पड़ोस स्थित एक घर में वह ट्यूशन पढ़ने जाने लगा। वहां उसकी बातों को सुनकर सभी हैरान रह जाते। पुनर्जन्म की बातों को भुलाने के तंत्र-मंत्र सहित हर तरह के प्रयास किए गए लेकिन कोई सफलता नहीं मिली। इसके चलते, बालक को एक बार गांव पारसौली घुमा लाने का मन बना लिया गया।

मनीष अभी छठवीं कक्षा में पढ़ता है और पूर्व जीवन की कई आदतें उसमें अभी भी विद्यमान हैं। मुख्तार सिंह के एक पहलवान होने के चलते उनमें रही ‘आक्रामकता’ अभी भी मनीष में देखी जा सकती है। उसका शरीर भी ‘असामान्य’ रूप से ताकतवर है। खेलों में उसकी ‘रुचि’ है लेकिन अब वह क्रिकेट खेलना ज्यादा पसंद करता है।

खाने-पीने को लेकर उसकी कई आदतें उसके पूर्व जन्म जैसी ही हैं, जैसे कि वह पहले की तरह अब भी पानी मिला दूध नहीं पीता है। उसे गिलास में दूध पीना पसंद नहीं है। दूध पीने के लिए वह चौड़े मुंह के थाली, लोटा, जग जैसे बर्तन की जिद करता है। उसे सूखे मेवे खाने का बेहद शौक है।

मनीष के पूर्व परिवार से मिलने के बाद उसके व्यवहार में आए किसी परिवर्तन के बारे में पूछने पर उसके पिता ने बताया कि वह अब पहले की तुलना में ‘शांत’ और ‘संतुलित’ नजर आता है जबकि पहले वह कहीं ज्यादा ‘उग्र’ और ‘बेचैन’ सा नजर आता था।

मुख्तार सिंह की मृत्यु और मनीष के जन्म के बीच करीब हफ्तेभर का ‘अंतर’ है, लेकिन इन सात-आठ दिन वह कहां था, इसका मनीष कोई ‘जवाब’ नहीं दे पाता है।

उधर, मुख्तार सिंह के बेटे सुरेश चौधरी ने बताया कि जब उन्हें पता चला कि उनके पिता ने मनीष के रूप में ‘पुनर्जन्म’ लिया है तो उन्होंने उक्त परिवार को गांव आने का न्योता दिया। गांव में आकर मनीष ने खुद ‘अपनी’ पशुशाला एवं घर पर सीधे चले आने के बाद उनकी मां भगवती देवी को ‘पत्नी’ के रूप में पहचान लिया और कई पुरानी बातें भी बताईं जिससे उन्हें ‘विश्वास’ हो गया कि उनके पिता ने मनीष के रूप में ‘जन्म’ लिया है।

‘घर’ आने पर पिता की तरह सम्मान कर बालक को विदा कर दिया गया है। दोनों परिवारों का मानना है कि अलग-अलग जाति होने और किसी भी तरह की रिश्तेदारी न होने के बावजूद दोनों घरों के बीच अब अटूट रिश्ता रहेगा।

Last modified onFriday, 20 July 2018 12:21
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