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एकल स्‍लैब वाला जीएसटी भारत में प्रासंगिक नहीं

Single Slab GST Is A Flawed Ideaदेश में नई अप्रत्‍यक्ष कर प्रणाली ‘वस्‍तु एवं सेवा कर' (जीएसटी) को लागू किए जाने के बाद एक साल की अवधि पूरी हो चुकी है। इस एकल टैक्‍स ने उन 17 करों और अनगिनत उपकरों (सेस) का स्‍थान लिया है जिन्हें केन्‍द्र एवं राज्‍य सरकारों ने लागू किया था। इससे पहले देश में अत्‍यंत जटिल कर प्रणाली लागू थी क्‍योंकि प्रत्‍येक करदाता को तरह-तरह के रिटर्न भरने पड़ते थे, उन्‍हें कई इंस्‍पेक्‍टरों एवं कर निर्धारण अधिकारियों का सामना करना पड़ता था, अपने किसी भी उत्‍पाद की आवाजाही होने पर प्रत्‍येक राज्‍य में अलग से टैक्‍स अदा करना पड़ता था और तरह-तरह की बाधाओं का सामना करने पर करदाता टैक्‍स अदायगी से बचने के उपाय ढूंढ़ने लगता था। जीएसटी का आधारभूत विचार मौलिक नहीं था। दुनिया के कई देशों में प्रयोग के तौर पर इसे लागू किया जा चुका है। अनेक तथ्‍यों को ध्‍यान में रखते हुए ही भारतीय मॉडल को विकसित करना जरूरी था। भारत राज्‍यों का एक ऐसा संघ है, जिसमें केन्‍द्र और राज्‍यों दोनों को ही राजकोषीय अथवा वित्‍तीय दृष्टि से सुदृढ़ होना अत्‍यंत जरूरी है। भारत राज्‍यों का परिसंघ नहीं है, इसलिए केन्‍द्र सरकार के राजस्‍व की कीमत पर राज्‍यों की राजस्‍व स्थिति को सुदृढ़ नहीं किया जा सकता है। यदि केन्‍द्र का ही अस्तित्‍व बरकरार नहीं रह पाएगा, तो ‘भारत’ यानी राज्‍यों के संघ का क्‍या होगा?

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यह कैसा सर्वे…!?

महिलाओं के लिए विश्व के सबसे खतरनाक देशएक फाउंडेशन द्वारा किया गया जनमत सर्वेक्षण-महिलाओं के लिए विश्व के सबसे खतरनाक देश 2018-आंकड़ों पर नहीं बल्कि अज्ञात व्यक्तियों की अवधारणाओं पर आधारित है।

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पत्रकारिता और राजनीति में ‘एच’ का सिद्धांत

धर्मेंद्र कुमारआज के दौर में, और शायद पहले भी, पत्रकारिता और राजनीति एक दूसरे के साथ समानांतर चलते प्रतीत होते हैं। हालांकि, पत्रकारिता का क्षेत्र राजनीति से कहीं ज्यादा बड़ा है। पत्रकारिता की भाषा में कहें तो राजनीति महज एक ‘बीट’ है लेकिन हमारे देश में चूंकि राजनीति ही सबसे बड़ा ‘रुचि’ का विषय है तो पत्रकारिता में राजनीति ही छायी रहती है।

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महिला साक्षरता : लंबा सफर अभी बाकी...

घरेलू काम काज मे हाथ बंटाकर रोजी-रोटी कमाने वाली 28 साल की पार्वती किताब, अखबार को हसरत से देखती है, पढ़ना उसके लिए सपना है। पार्वती निरक्षर है, अलबत्ता उसके दो भाई कॉलेज मे स्नातकोत्तर शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। उसकी लगभग 50 साल की मां सावित्री भी निरक्षर है, सावित्री बताती है कि उसकी मां ने भी कभी पढ़ाई नहीं की। मां बताती है कि उसका पति और पार्वती का पति कुछ पढ़े-लिखे जरूर हैं। पिता की पहली वाली पुरुषो की पीढ़ी अनपढ़ ही थी लेकिन अब पार्वती के बेटे के साथ उसकी नौ साल की बेटी एक अच्छे स्कूल मे पढ़ती है। अब पार्वती का सपना है कि बड़ी होकर उसकी बेटी 'बड़े घरों की मेडमों' जैसी नौकरी करे, अपनी गाड़ी खुद चलाए और जब उसका मन हो शादी करे ताकि उस के बच्चे अनपढ मां की संतानें नहीं हों। जब उसे सुझाव दिया जाता है कि 'बच्ची के साथ तुम भी पढ़ो' तो उसके चेहरे पर उदासी तैरने लगती है। मद्धिम सी आवाज मे बुदबुदाती है... "अब कहां पढ़ पाऊंगी?"

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