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वैश्विक जीवन एवं निरंतरता पर गांधीवादी दृष्टिकोण

वैश्विक जीवन एवं निरंतरता पर गांधीवादी दृष्टिकोण

आधुनिकीकरण ने एक व्यक्ति के सामर्थ्य को वैश्विक रूप प्रदान किया है। उपग्रह संचार, वायु मार्गों एवं भारी जमीनी उपकरणों के साथ अब हमारी शक्ति और क्षमता वैश्विक हो गई है। अल्फ्रेड नार्थ वाइटहेड के शब्दों में आज का व्यक्ति जो भी बना है उसमें सम्पूर्ण दुनिया का उदय और सम्मिलन शामिल है। मानव जीवन ने विश्वरूप हासिल कर लिया है।

वैश्विक जीवन ने कई चुनौतियां को भी जन्म दिया है। अपने दैनिक जीवन में हम आत्मकेंद्रित व्यवहार से लेकर पर्यावरणीय क्षति जैसी आचार सम्बन्धी उल्लंघनों का नित दर्शन करते हैं। विश्व में सर्वश्रेष्ठ हासिल करने की चाह में ऐसा प्रतीत हो रहा है कि हम शिष्ट समाज के एक जोखिमभरे पथ पर चले जा रहे हैं।

यूरोप में आधुनिक विज्ञान और औद्योगिक क्रांति के प्रारंभिक खतरों के शुरुआती दुष्परिणाम को स्वयं प्रत्यक्ष रूप से अनुभव करने और मानव सभ्यता पर इसके दुष्प्रभाव को देखने के बाद गांधीजी ने एक वैकल्पिक जीवनशैली की प्रस्तावना की। यह भौतिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक जीवन का एक सुन्दर सम्मिश्रण था, जैसा कि गांधीजी कहते थे, शब्दों, विचारों और कर्म में समन्वय होना। जेसी कुमारप्पा ने इसे यथोचित जीवनशैली कहा।

पारिस्थितिक उपयुक्तताओं जैसे सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, जैव एवं पारिस्थितिक विज्ञान को ध्यान में रखते हुए यह जीवन जीने की अनुकूलतम जीवन शैली का प्रतिनिधित्व करती है। इसका अर्थ सबकुछ एक अनुकूल अनुपात में करना, न ज्यादा न कम। यह किसी भी परिस्थिति में सर्वश्रेष्ठ परिणाम देती है तथा यह प्रकृति से अधिक सामंजस्यपूर्ण है।

इस अनुकूलता के सिद्धांत को आप उनकी जीवन पद्धति के सभी पहलुओं को परिभाषित करते देख सकते हैं चाहे वह निजी जीवन हो या राष्ट्रीय जीवन हो अथवा शारीरिक या आध्यात्मिक जीवन ही क्यों न हो। उदाहरण के लिया गांधीजी ने सिर्फ उपयुक्त एवं अनुकूल प्रौद्योगिकी का प्रतिपादन किया, यह इतनी पुरानी भी नहीं होनी चाहिए कि किसी काम की न रहे और न ही इतनी परिष्कृत की उपयोगकर्ता को अचंभित कर दे। उन्होंने कहा की सिलाई मशीन इसी तरह की एक उपयुक्त मशीन है। यह उपयोगकर्ता को हाथ से सिलाई के परिश्रम से बचाती है साथ ही यह इतनी अधिक मात्रा में उत्पादन नहीं करती की बेरोजगारी उत्पन्न हो तथा न ही यह बिजली का उपयोग करती है और न ही कोई प्रदूषण।

किसी भी अर्थव्यवस्था में रोजगार एक मापा जा सकने वाला संसाधन है। पुंज या थोक उत्पादन कुछ को वैश्विक हिस्से में से औसत से अधिक लेने की अनुमति देता है जिसकी वजह से काफी बड़ी संख्या में लोगों को औसत से कम प्राप्त होता है जिसकी वजह से एक बहुत बड़ा अवसर अन्तराल उत्पन्न होता है जिसे हम बेरोजगारी कहते हैं। विश्वव्यापी निर्माण और उत्पादन संगुटिकाओं के स्थान पर विकेन्द्रित ग्रामीण उद्योगों का उन्होंने प्रतिपादन किया ताकि उत्पादन संभावनाओं और रोज़गार आवश्यकताओं का अनुकूलतम उपयोग किया जा सके। जेसी कुमारप्पा के शब्दों में उन्होंने टिकाऊ अर्थव्यवस्था का प्रतिपादन किया था। उचित उपकरण के साथ भूमि पर रोटी श्रम, ऐसा जीवन जीने के लायक होता है, गांधीजी ने रस्किन बांड के इन विचारों का भी अनुमोदन किया क्योंकि यह अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी दोनों को ही उचित न्याय देता है।

गरीबी और वैभव दो चरम सीमाएं हैं। गांधीजी के अनुकूलतम दृष्टिकोण की विशिष्टता यह है कि गरीबी को हटाने पर काम करते वक़्त (उनके 18 रचनात्मक कार्यक्रमों में से एक) उन्होंने समान रूप से ही 'स्वैच्छिक गरीबी' जिनके पास आवश्यकता से अधिक है, पर भी उतना ही जोर दिया है। गांधीजी के अनुसार स्वैच्छिक गरीबी के लिए प्रस्तावित संरचनात्मक व्यवस्था 'ट्रस्टीशिप' की थी। उन्होंने जमनालाल बजाज से कहा कि वह अपने धन के ट्रस्टी बन जाएं और इसे लाखों गरीब लोगों के उपयोग के लिए उपलब्ध करा दें।

गांधी के अहिंसक उचित आर्थिक विचारों से संकेत लेते हुए ब्रिटिश अर्थशास्त्री ईएफ शूमाकर ने लिखा, "लघु उत्तम है: अर्थशास्त्र का एक ऐसा अध्ययन जिसमें लोग अहम हैं।” क्लब ऑफ़ रोम जोकि नोबेल पुरस्कार विजेताओं का एक संघ है उसने 'सीमित संसाधनों के साथ चरघातांकी आर्थिक एवं जनसंख्या वृद्धि के कंप्यूटर सिमुलेशन' पर आधारित अध्ययन से एक रिपोर्ट संन्लिखित की। उन सभी ने स्वयं संयमित उपयुक्त जीवनशैली का समर्थन किया।

पारिस्थितिकी ऋण दिवस एक कैलेंडर में वह स्थान चिह्नित करता है जिसके पश्चात मानव द्वारा किए गए प्राकृतिक संसाधनों के उपभोग को प्रकृति उस वर्ष पुनः प्राप्त नहीं कर सकती है। यदि यह उपभोग संवहनीय दर से होता है तो यह दिवस वर्ष के अंत में आना चाहिए। अभी स्थिति यह है कि मनुष्य 365 दिन के प्रावधान को मात्र 225 दिन में ही समाप्त कर लेता है। मानवता जिस प्रकार से अपनी वार्षिक संसाधनों को एक निश्चित दिन तक समाप्त कर लेती है, उस वजह से गांधीजी ने जो कहा था वह एक तरह से भविष्यवाणी ही प्रतीत होती है: ‘पृथ्वी पर हर मनुष्य की आवश्यकता पूर्ण करने के संसाधन तो हैं किन्तु सबकी लालसा पूर्ण करने के लिए नहीं’; ‘आवश्यकता से अधिक उपभोग एक प्रकार से चोरी करने के बराबर है’ , जो कि प्रकृति के प्रति एक हिंसा के सामान है। हो सकता है कि ‘लालसा की पूर्ति’ के स्थान पर यदि ‘आवश्यकताओं की पूर्ति’ की जाए तो शायद हम पारिस्थितिकी ऋण दिवस को कुछ पीछे कर सकें।

ग्राम राज्य की जो अवधारणा गांधीजी ने प्रतिपादित की थी वह एक अनुकूलतम समाज को दर्शाती है। किसी भी व्यक्ति को सामाजिक जुड़ाव (सहयोग और आपसी सहायता) की आवश्यकता होती है परन्तु इसका परिमाण किस हद तक बढ़ाया जा सकता है इसकी एक बहुत ही छोटी सीमा होती है। एक स्वस्थ समाज वह है जिसमें कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से अन्य जनों तक पहुंच सकता है। उन्होंने समुद्रीय परिमंडल के जैसे एक सामाजिक व्यवस्था की परिकल्पना की जिसके केंद्र में व्यक्ति होगा फिर क्रमशः परिवार, गांव, जिला, राज्य, देश एवं दुनिया होगी।

वैश्विक जीवन ने विविध मनुष्यों के एक साथ मिलकर रहने को जन्म दिया। विभिन्न धर्मों, जातीय और सांस्कृतिक उन्मुखीकरण के लोग हर इलाके में रहने के लिए आ गए हैं। सूचना प्रौद्योगिकी ने भू दूरी को वैसे भी ख़त्म कर दिया है। स्वयं की धार्मिक-सांस्कृतिक संबद्धता और सामाजिक विविधता के मद्देनजर एक अनुरूपित आचरण के लिए हमें एक मध्यवर्ती व्यवहार स्वरूप को अपनाने की जरूरत है। गांधीजी के 11 व्रतों में से एक “सर्वधर्म सम्भाव” इस सद्गुण के महत्व को बताता है खासकर जो वैश्विक लोग हैं उनके लिए।

ई स्टेनली जोन्स जो कि एक अमेरिकी मेथोडिस्ट पुजारी थे उन्होंने जब गांधीजी से पूछा, मसीह कहते हैं ‘अपने पड़ोसी से प्रेम करो’, आप अहिंसा का इससे बेहतर क्या संदेश दे सकते हैं? गांधीजी ने यह कहते हुए जवाब दिया कि ‘मेरा कोई शत्रु नहीं है’। उन्होंने कहा 'गुनाह और गुनाहकर्ता दोनों एक नहीं हैं'। मैं 'गुनाह' के खिलाफ हूं, गुनाहकर्ता तो मेरा ही व्यक्ति है। शत्रु से प्यार करने की तुलना में, दूसरों में 'दुश्मन' को खोजने की आदत पर काबू पाना अधिक महत्वपूर्ण है।

विस्तृत मानव व्यवहार में हिंसा और अहिंसा दो अलग-अलग अंतिम सिरे हैं जिसमें पूर्ण हिंसा एक सिरे पर है तो नैतिकतावादी अहिंसा दूसरे सिरे पर। हालांकि गांधीजी अहिंसा के समर्थक थे किन्तु इसकी चरम अभिव्यक्ति की जगह उन्होंने इसके व्यवहारिक स्वरूप तक ही अपने को सीमित रखा। इसीलिए उन्हें कुछ अपरिहार्य प्रकार की हिंसा भी स्वीकार थी जैसे फसलों को नष्ट करने वाले जानवरों को दूर भगाना।

गांधीजी ने अपने इष्टतम द्रष्टिकोण को स्वास्थ्य और स्वच्छता में भी प्रयुक्त किया। आज विश्व स्वास्थ्य संगठन ने यह घोषित कर दिया है कि, 'मोटापा' एक वैश्विक महामारी है और जीवन शैली से उत्पन्न सभी खतरों का एकमात्र स्रोत है। गांधीजी ने तर्क दिया, "असाधारण शरीर वाला व्यक्ति जरूरी नहीं कि स्वस्थ ही है। गांधीजी का कहना है कि संभवतः उसने अपनी यह मांसपेशियां कोई अन्य मूल्य देकर अर्जित की हैं। अपनी पुस्तक स्वास्थ्य की कुंजी में उन्होंने सिर्फ पर्याप्त पौष्टिक भोजन, सक्रिय भौतिक जीवन, अच्छी नींद और स्वस्थ सोच द्वारा एक संतुलित जीवन का प्रस्ताव रखा था। उनका पर्यावरण के अनुकूल शौचालय का डिजाइन अपने समय में सर्वश्रेष्ठ था और इसे 'वर्धा शौचालय मॉडल' कहा जाता था।

पृथ्वी इस समय इस पर मौजूद एवं भविष्य में आने वाले सभी जीवों की धरोहर है। एक भव्य जीवन की हमारी होड़ में, अगर हम इस पृथ्वी को एक उपभोगित, समाप्त प्राय रूप में पहुंचा दें तो, शायद हम प्रकृति के खिलाफ एक घोर अन्याय कर रहे हैं। गांधीजी के जीवनशैली के अहिंसक तरीके और इसके उचित उपकरण,  विकेन्द्रित सामाजिक व्यवस्था के साथ सक्षम अर्थव्यवस्था जो एक व्यक्ति को अपने पारिस्थितिकी तंत्र के सहजीवी होने में सक्षम करती है, आज हमारे लिए और अधिक प्रासंगिक सीख लगती है।

(लेखक गुजरात विद्यापीठ के पूर्व छात्र वर्तमान में गांधी अनुसंधान प्रतिष्ठान जलगावं, महाराष्ट्र के डीन हैं)

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