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चुनौतियों से भरे 70 साल; क्या खोया, क्या पाया…!

ब्रिटिश हुकूमत का मतलब क्या था यह उस समय के आंदोलन के इतिहास के एक अंश से समझा जा सकता है। महात्मा गांधी ने ‘यंग इंडिया’ में लिखा“ हमें अनुभव होता हो या न होता हो, कुछ दिन से हम पर एक प्रकार का फौजी शासन हो रहा है। फौजों का शासन आखिर है क्या? यही कि सैनिक अफसर की मर्जी ही कानून बन जाती है और वह चाहे साधारण कानून को ताक पर रखकर विशेष आज्ञाएं लाद देता है और जनता बेचारी में उनके विरोध करने का दम नहीं होता, पर मैं आशा करता हूं, वे दिन जाते रहे कि अंग्रेज शासकों के फरमानों के आगे हम चुपचाप सिर झुका दें...”

सत्तर वर्ष पहले ब्रिटिश साम्राज्य में भारतीय जनता के हालात को समझने और उसके खिलाफ संघर्ष को याद करना किसी स्कूली पाठ्यक्रम को पढ़कर परीक्षा में पास करने की एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं है। उसे महसूस करना ही पाठ्यक्रम के उद्देश्यों को पूरा करता है। पूरी दुनिया में मानव सभ्यता के भीतर उन तमाम तरह की बुराईयों के खिलाफ संघर्ष होता रहा है जब इंसानी हक हकूक को शासक होने के नाते कोई अपने मातहत करने की कोशिश करता है। उन संघर्षों को नई पीढ़ी को महसूस करना होता है ताकि वह इंसानी हक हकूक को लेकर बराबर संवेदनशील रहे और अपने हासिल किए अधिकारों के प्रति चौकन्ना रहें। यह सिलसिला पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है। 70 वर्षों की आजादी के मूल्यांकन की यह कसौटी हो सकती कि मौजूदा पीढ़ी को संघर्ष की वह विरासत के रूप में मिली है।

नई पीढ़ी के सामने दस्तावेज के रूप में एक संविधान है। अंग्रेजों के शासन को समाप्त करने के लिए सब लोग एकमत हुए तो इस संकल्प के साथ कि भविष्य को हम अपने तरीके से मिल जुलकर संचालित करेंगे। इसीलिए, सत्ता हस्तानांतरण के बाद हमने अपने संविधान में पहला वाक्य यही लिखा कि हम भारत के लोग अब बराबरी, सम्मान और भाईचारे वाला समाज बनाने के लिए यात्रा शुरू कर रहे हैं। उस समय की हमारी स्थिति का आकलन डॉ. अम्बेडकर के इस कथन से किया जा सकता है : ‘‘26, जनवरी 1950 को हमलोग विसंगति से भरे हुए जीवन में प्रवेश करने वाले हैं। राजनीतिक दृष्टि से अपने पास समता रहेगी (यानी अपने प्रतिनिधि चुनने के लिए एक वोट देने का अधिकार रहेगा), पर सामाजिक और आर्थिक जीवन में विषमता रहेगी। आगे कहते है कि ऐसी विसंगति भरा जीवन हम लोग कब तक जिएंगे? अपने सामाजिक व आर्थिक जीवन में हम कब तक समता को नकारेंगे? यदि लंबे समय तक हम उसे नकारते रहें तो अपने राजनीतिक लोकतंत्र को खतरे में डाल लेंगे। इस विसंगति को यथाशीघ्र दूर करना चाहिए। वे चेतावनी देते हैं कि नहीं तो विषमता के शिकार लोग उसमें सुरंग लगा देंगे।’

पूरी दुनिया में कई देशों को ब्रिटिश साम्राज्य से उस समय आजादी मिली। सभी देश अपने अपने तरीके से उस आजादी का मूल्यांकन कर रहे हैं। हमारे देश में भी ये मूल्यांकन किया जा रहा है। 70 वर्षों में हमने अपने संकल्प को किस हद तक पूरा किया है। लेकिन, उससे पहले हमें यह समझना होगा कि आखिर संविधान में जो संकल्प लिया गय़ा उसके सामने किस तरह की चुनौती रही है। 26 नवम्बर 1949 को डॉ. अम्बेडकर संविधान सभा के समक्ष कहते हैं : ‘‘सामाजिक व मानस शास्त्रीय अर्थ में हम एक राष्ट्र नहीं हैं, यह जितनी जल्दी हमारे ध्यान में आ जाएगा, हमारे लिए उतना हितकर होगा... जातियां सामाजिक जीवन में परस्पर द्वेष और विलगाव का निर्माण करती हैं। इसलिए, जाति राष्ट्र विरोधी होती है। लेकिन, हमें एक राष्ट्र बनना हो तो इस सारी कठिनाइयों पर जीत हासिल करनी होगी क्योंकि जब एक राष्ट्र होगा, तभी बंधुता की भावना आकार ले सकती है। बंधुता यानी भाईचारे के बिना बराबरी व स्वतंत्रता केवल ऊपरी दिखावा मात्र रहेगी।’

सत्तर वर्ष तक की यह यात्रा हमें सभी मोर्चे पर एक जैसी राय बनाने से रोकती है। हम यह दावा नहीं कर सकते हैं कि हमने अपने संकल्प पूरे कर लिए हैं। यानी, सत्ता हस्तानांतरण के बाद पुराने ढांचे की विकृतियां व प्रवृतियां बनी हुई हैं। दरअसल उपनिवेशवाद के दौर से निकले देशों के सामने तीन तरह की चुनौती रही हैं। एक चुनौती तो उस ढांचे के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक ढांचे के अवेशषों को खत्म करने की जिस ढांचे को चुनौती देकर आजाद होने का दावा किया जाता है। दूसरी चुनौती उस सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक ढांचे के अवशेषों को समाप्त करने की जिनकी वजह से हमें गुलामी का शिकार होना पड़ा और तीसरी चुनौती एक नए समाज की परिकल्पना कर उसे पूरा करने के लिए नीतियां बनाना और उनके आधार पर कार्यक्रमों को निर्धारित करना। हमारे देश में तीनों स्तरों पर संघर्ष की प्रक्रिया विभिन्न स्तरों पर चलती रही है। सरकार अपने स्तर पर कोशिशों को अंजाम देती रही है तो दूसरी तरफ विविधता वाले समाज का हर हिस्सा अपने अपने स्तर पर उन चुनौतियों से जूझता रहा है। डॉ. अम्बेडकर ने इसे ही कठिनाईयों पर जीत के रूप में व्यक्त किया है।

दरअसल हम जब 70 वर्ष की आजादी की बात कर रहे है तो इसका मकसद इस बात पर जोर देना भी है कि हमें अपनी चुनौतियों का मुकाबला करने की गति को तीव्र करना चाहिए। कोई वरिष्ठ नागरिक यदि कहते हुए हमारे आसपास मिलता है कि हमने सचमुच आजादी की सांसें लेकर अपने जीवन की यह यात्रा पूरी की है तो समझना चाहिए कि सचमुच हमारी आजादी दुनिया के दूसरे देशों के सामने एक मिसाल के रूप में स्थापित है।

(लेखक पत्रकार हैं। इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं।)

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