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'रोने' का नहीं, 'समझने' का वक्त है...

'रोने' का नहीं, 'समझने' का वक्त है...

धर्मेंद्र कुमार... कुल जमा 300 लोग एनडीटीवी से निकाले गए, मल्लिकार्जुन खड़गे नहीं 'खड़के'...; 300 लोग दैनिक जागरण से निकाले गए, खड़गे नहीं खड़के; 250 लोग टाइम्स ऑफ इंडिया से निकाले गए, खड़गे नहीं खड़के...; करीब इतने ही लोग हिंदुस्तान टाइम्स से निकाले गए, खड़गे नहीं खड़के; 700 लोग सहारा इंडिया और अन्य मीडिया संस्थानों से निकाले गए, खड़गे नहीं खड़के...; नरेंद्र मोदी शासन में 5000 से ज्यादा छोटे और मझोले अखबार बंद हो गए और हजारों मीडियाकर्मी बेरोजगार हुए, खड़गे तब भी नहीं खड़के...। अब ऐसा क्या हुआ कि तीन 'खास' मीडियाकर्मियों को जब 'उनके' संस्थानों ने निकाला तो खड़गे न सिर्फ 'खड़के' बल्कि खूब जोर से 'भड़के' भी...???!!!

मजीठिया वेज बोर्ड को लागू करने में कभी भी, किसी भी नेता ने ऐसी 'फुर्ती' नहीं दिखाई। बीते 10-15 सालों में कांग्रेस की भी सरकार रही और अब मोदी सरकार को भी पूरे चार साल हो गए हैं। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी अपना 'डंडा' चला दिया लेकिन राज्य सरकारों को 'निर्देश' देने के अलावा इन सरकारों ने क्या किया? यह कितना सुनिश्चित किया कि कोई भी मीडिया संस्थान इसे लागू करने से बचने न पाए।

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वीडियो साभार : राइजिंग राहुल

सरकारों को छोड़िए, इन 'महान' पत्रकारों ने क्या किया?? उल्टे प्रबंधनों को 'निकल' भागने के रास्ते ही सुझाए। पत्रकारों को 'कॉन्ट्रेक्ट' पर रखकर 'पालतू' बना लेने का 'आइडिया' इन्हीं लोगों ने दिया। किसी ने सुझाया कि कैमरामैन या वीडियोग्राफर्स की कोई 'जरूरत' ही नहीं है मोबाइल से वीडियो बन जाएंगे तो किसी ने कहा कि रिपोर्टर - स्ट्रिंगर की कोई जरूरत नहीं है, वह 'खुद' ही प्राइमटाइम 'निकाल' देगा। न केवल प्राइम टाइम 'चमका' देगा बल्कि मालिक को बढ़िया 'डील' भी दिला देगा।    

हमें खड़गे या मोदी जैसे नेता-नतेड़ों से कोई फर्क नहीं पड़ता...। 'फर्क' पड़ता है उनसे, जिन पर पत्रकारिता के 'मिशन' को आगे बढ़ाने की 'जिम्मेदारी' थी या उन्होंने 'खुद' यह जिम्मेदारी ले ली थी...। उन लोगों ने क्या किया...? उन लोगों ने पत्रकारिता को नीचे से काटा। ग्रास रूट पर बिना किसी मोह-माया के काम करने वालों को काटा। 100-200 रुपये के मेहनताने को यह कहकर बंद कर दिया कि कंपनी इतना 'खर्चा' नहीं झेल सकती है। यह अलग बात है कि कंपनी इनकी 3-4 लाख प्रति माह की तनख्वाह को बिल्कुल आराम से झेल सकती है। परिणाम यह हुआ कि 'अंतिम आदमी' की खबरें आना बंद हो गईं। अब जब खबरें आना बंद हुईं तो ये पत्रकारिता के 'पहरेदार' क्या करते...? एसी कमरे में बैठकर दो मुल्लाओं, दो पाकिस्तानी पत्रकारों और दो विहिप के आताताइयों को पकड़कर मुर्गों की तरह लड़वाना शुरू कर दिया। एक बच्चा बोरवैल में गिर गया तो 24 घंटे उसी में 'खींच' दिए। यह नहीं देखा कि उसी दिन देशभर में 50 और बच्चे भी ऐसे ही किसी बोरवैल में गिरे हैं जिनकी खबर देने के लिए हमारे पास कोई स्ट्रिंगर ही नहीं बचा है। बचे समय में मुलायम सिंह, अखिलेश यादव, मायावती और नरेंद्र मोदी, जिसके जो माफिक आए, को गालियां देने का काम शुरू कर दिया और नौकरी हो गई 'पक्की'। कोई मौका मिल गया तो गोटी फिट कर के 'नेता' बन बैठे।

करीब 15-20 पहले जब हमने अपना करियर शुरू किया तब न तो हम पर पैसे होते थे और न हमारे वरिष्ठ पत्रकारों के पास...। दिन-रात सिर्फ काम करते रहने का 'ज्ञान' मिलता रहा। इन लोगों ने 'गंदगी' फैलाई कि सारे 'पैसे' इन्हें दो और ये 'ठेके' पर काम कराएंगे। परिणाम पत्रकारिता के इतने बड़े नुकसान के रूप में आया कि अब इन्हीं लोगों के सामने 'विश्वसनीयता' का ही संकट खड़ा हो गया।

पत्रकारिता का इन 'स्वयंभू' पत्रकारों ने इतना नाश कर दिया कि अब हमारे ऑफिस में कोई भी 'पत्रकार' बनने नहीं आता, आता है तो केवल 'एंकर' या 'एंकरनी' बनने.., क्योंकि पत्रकारिता तो 'नए' बच्चे जानते ही नहीं कि क्या 'चीज' होती है। अभी पिछले दिनों पत्रकारिता का एक 'छात्र' तो हमारे यहां सिर्फ 'इंटरव्यूअर' बनने आया। उसे 'पत्रकार' नहीं, केवल 'साक्षात्कारकर्ता' बनकर लोगों पर 'हावी' होना था।

इसलिए, दुखी होने की जरूरत नहीं है। जो बोया जाता है, वही काटना भी पड़ता है। अपनी बर्बादी के लिए नेताओं या किसी और को दोष दोने के बजाय अपने गिरेबां में झांकने की जरूरत है...। वरना..., जो है सो है...।

Last modified onMonday, 06 August 2018 10:22

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