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इश्केदिल की ‘उलझनें’

इश्केदिल की ‘उलझनें’

इश्केदिल की ‘उलझनें’दोनों एक झोंक में एकदूजे के पास आ गए और अचानक से उसके कांपते होंठों को उसके कोमल होंठो ने थाम लिया। उसकी आंखें बुझती चली गईं और अंदर मीठी सी तरंग दौड़ गई। अचानक से, उसने एक उत्सुकता में अपनी आंखें हल्के से खोलीं तो देखा क़ि दो आंखें उसे भी उस तरंगित दौर में बड़े प्यार से निहार रही थीं।

...और फिर जब होठों ने एक दूसरे को उलझनों से मुक्त किया तो उसने पूछा, "तुमने आंखे क्यूं खोली हुई थीं...", "ताकि, उस दौरान तुम्हारे चेहरे के भाव पढ़ सकूं, लेकिन यह बताओ कि तुमने आंखें बीच में क्यूं खोली?" उसने पूछा...।

"ताकि, मुझे निहारती हुई तेरी आंखों को देख सकूं" उसने मुस्कुरा के कहा...। हंसते हुए दोनों करीब आ गए और उलझनों का एक दौर फिर शुरू हो गया...

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