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यमराज की चार ‘चिट्ठियां’

यमराज की चार ‘चिट्ठियां’

चिट्ठियांएक चतुर व्यक्ति को यमराज से बहुत डर लगता था। एक दिन उसे एक चतुराई सूझी और उसने यमराज को अपना मित्र बना लिया। उसने अपने मित्र यमराज से कहा, “मित्र! तुम किसी को भी नहीं छोड़ते हो, किसी दिन मुझे भी धर लोगे!”

यमराज ने कहा, “यह मृत्यु लोक है, जो आया है उसे मरना ही है। सृष्टि का यह शाश्वत नियम है। इस लिए मैं मजबूर हूं। मुझ से क्या आशा रखते हो, साफ-साफ कहो।”

व्यक्ति ने कहा, “मित्र! मैं बस इतना ही चाहता हूं कि आप मुझे अपने लोक ले जाने के लिए आने से कुछ दिन पहले एक पत्र अवश्य लिख देना ताकि मैं अपने बाल-बच्चों को कारोबार की सभी बातें अच्छी तरह से समझा दूं और स्वयं भी भगवान भजन में लग जाऊं।“

यमराज ने प्रेम से कहा, “यह कौन सी बड़ी बात है, मैं एक नहीं आपको चार पत्र भेजूंगा। चारों पत्रों के बीच समय भी अच्छा खासा दूंगा ताकि तुम सचेत होकर काम निपटा सको।”

मनुष्य बड़ा प्रसन्न हुआ सोचने लगा कि आज से मेरे मन से यमराज का भय भी निकल गया। मैं जाने से पूर्व अपने सभी कार्य पूर्ण करके जाऊंगा तो देवता भी मेरा स्वागत करेंगे।

दिन बीतते गए, आखिर मृत्यु की घड़ी आ पहुंची। यमराज अपने दूतों सहित उसके समीप आकर बोले, “मित्र अब समय पूरा हुआ। मेरे साथ चलिए, मैं सत्यता और दृढ़तापूर्वक अपने स्वामी की आज्ञा का पालन करते हुए एक क्षण भी तुम्हें और यहां नहीं छोड़ूंगा।”

मनुष्य के माथे पर बल पड़ गए, भृकुटी तन गई और कहने लगा, “धिक्कार है तुम्हारे जैसे मित्रों पर.., मेरे साथ विश्वासघात करते हुए तुम्हें लज्जा नहीं आती? तुमने मुझे वचन दिया था कि लेने आने से पहले पत्र लिखूंगा। मुझे बड़ा दुःख है कि तुम बिना किसी सूचना के अचानक दूतों सहित मेरे ऊपर चढ़ आए। मित्रता तो दूर रही, तुमने तो अपने वचनों को भी नहीं निभाया।”

यमराज हंसे और बोले, “मित्र! इतना झूठ तो न बोलो। मेरे सामने ही मुझे झूठा सिद्ध कर रहे हो। मैंने आपको एक नहीं चार पत्र भेजे लेकिन आपने एक का भी उत्तर नहीं दिया।”

मनुष्य ने चौंककर पूछा, “कौन से पत्र? कोई प्रमाण है? मुझे पत्र प्राप्त होने की कोई डाक रसीद आपके पास है तो दिखाओ!”

यमराज ने कहा, “मित्र, मेरे चारों पत्र इस समय आपके पास मौजूद हैं। मेरा पहला पत्र आपके सिर पर चढ़कर बोला। आपके काले सुन्दर बालों को पकड़कर उन्हें सफ़ेद कर दिया और यह भी कहा कि सावधान हो जाओ, जो करना है कर डालो। नाम, बड़ाई और धन-संग्रह के झंझटों को छोड़कर भजन में लग जाओ। लेकिन, मेरे पत्र का आपके ऊपर जरा भी असर नहीं हुआ। उल्टे, बनावटी रंग लगाकर आपने अपने बालों को फिर से काला कर लिया और पुनः जवान बनने के सपनों में खो गए। आज तक मेरे श्वेत अक्षर आपके सिर पर लिखे हुए हैं।”

“कुछ दिन बाद मैंने दूसरा पत्र आपके नेत्रों के प्रति भेजा। नेत्रों की ज्योति मंद होने लगी। फिर भी आंखों पर मोटे शीशे चढ़ाकर आप जगत को देखने का प्रयत्न करने लगे। दो मिनट भी संसार की ओर से आंखें बंद करके, ज्योतिस्वरूप प्रभु का ध्यान मन में नहीं किया।”

“इतने पर भी सावधान नहीं हुए तो मुझे आपकी दीनदशा पर बहुत तरस आया और मित्रता के नाते मैंने तीसरा पत्र भी भेजा। इस पत्र ने आपके दांतो को छुआ, हिलाया और तोड़ दिया। आपने इस पत्र का भी जवाब न दिया बल्कि नकली दांत लगवाए और जबर्दस्ती संसार के भौतिक पदार्थों का स्वाद लेने लगे। मुझे बहुत दुःख हुआ कि मैं सदा इसके भले की सोचता हूं और यह हर बार एक नया, बनावटी रास्ता अपनाने को तैयार रहता है।”

“अपने अन्तिम पत्र के रूप में मैंने रोग, क्लेश तथा पीड़ाओं को भेजा परन्तु आपने अहंकारवश सब अनसुना कर दिया।”

जब मनुष्य ने यमराज के भेजे हुए पत्रों को समझा तो फूट-फूटकर रोने लगा और अपने विपरीत कर्मों पर पश्चाताप करने लगा। उसने स्वीकार किया कि उसने गफलत में शुभ चेतावनीभरे इन पत्रों को नहीं पढ़ा। सदा यही सोचता रहा कि कल से भगवान का भजन करूंगा। अपनी कमाई अच्छे शुभ कार्यों में लगाऊंगा, पर वह कल कभी नहीं आया।

मनुष्य को जब अपनी बातों से काम बनता नज़र नहीं आया तो उसने यमराज को करोड़ों की सम्पत्ति का लोभ दिखाया। यमराज ने हंसकर कहा, “मित्र, यह मेरे लिए धूल से अधिक कुछ भी नहीं है। धन-दौलत, शोहरत, सत्ता…, ये सब लोभ संसारी लोगों को वश में कर सकते हैं, मुझे नहीं।”

मनुष्य ने पूछा, “क्या कोई ऐसी वस्तु नहीं जो तुम्हें भी प्रिय हो, जिससे तुम्हें लुभाया जा सके?”

यमराज ने उत्तर दिया, “यदि तुम मुझे लुभाना ही चाहते थे तो सच्चाई और शुभ कर्मों का धन संग्रह करते। यह ऐसा धन है जिसके आगे मैं विवश हो सकता था। अपने निर्णय पर पुनर्विचार को बाध्य हो सकता था,पर तुम्हारे पास तो यह धन धेलेभर का भी नहीं है।”

यमराज ने जब मनुष्य की एक भी बात नहीं सुनी तो वह हाय-हाय करके रोने लगा। सभी सम्बन्धियों को पुकारा परन्तु यमराज ने उसके प्राण पकड़ लिए और चल पड़े अपने गन्तव्य की ओर…

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