Menu

 


राजनीतिक ‘हिन्दूकरण’ के प्रबल पक्षधर थे सावरकर

राजनीतिक ‘हिन्दूकरण’ के प्रबल पक्षधर थे सावरकर

राजनीतिक ‘हिन्दूकरण’ के प्रबल पक्षधर थे सावरकरहिन्दू राष्ट्र की राजनीतिक विचारधारा को विकसित करने का बहुत बड़ा श्रेय सावरकर को जाता है। ऐसा माना जाता है कि उनकी इस विचारधारा के कारण आजादी के बाद की सरकारों ने उन्हें वह महत्व नहीं दिया जिसके वह वास्तविक हकदार थे। उन्हें प्रायः ‘स्वातंत्र्यवीर वीर सावरकर’ के नाम से सम्बोधित किया जाता है।

सावरकर 20वीं शताब्दी के सबसे बड़े हिन्दूवादी रहे। विनायक दामोदर सावरकर को बचपन से ही हिंदू शब्द से बेहद लगाव था। सावरकर ने जीवनभर हिंदू, हिन्दी और हिंदुस्तान के लिए ही काम किया। सावरकर को छह बार अखिल भारत हिंदू महासभा का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया। 1937 में उन्हें हिंदू महासभा का अध्यक्ष चुना गया जिसके बाद 1938 में हिंदू महासभा को राजनीतिक दल घोषित कर दिया गया। हिन्दू राष्ट्र की राजनीतिक विचारधारा ‘हिन्दुत्व’ को विकसित करने का बहुत बड़ा श्रेय सावरकर को जाता है। वह न केवल स्वाधीनता-संग्राम के एक तेजस्वी सेनानी थे अपितु महान क्रान्तिकारी, चिन्तक, सिद्धहस्त लेखक, कवि, ओजस्वी वक्ता तथा दूरदर्शी राजनेता भी थे। वह एक ऐसे इतिहासकार भी हैं जिन्होंने हिन्दू राष्ट्र की विजय के इतिहास को प्रामाणिक ढंग से लिपिबद्ध किया है। उन्होंने 1857 के प्रथम स्वातंत्र्य समर का सनसनीखेज व खोजपूर्ण इतिहास लिखकर ब्रिटिश शासन को हिलाकर रख दिया था। वह एक वकील, राजनीतिज्ञ, कवि, लेखक और नाटककार थे। उन्होंने परिवर्तित हिंदुओं के हिंदू धर्म को वापस लौटाने के लिए सतत प्रयास किए एवं आंदोलन चलाए।

सावरकर ने भारत के एक सार के रूप में एक सामूहिक "हिंदू" पहचान बनाने के लिए हिंदुत्व का शब्द गढ़ा। उनके राजनीतिक दर्शन में उपयोगितावाद, तर्कवाद और सकारात्मकवाद, मानवतावाद और सार्वभौमिकता, व्यावहारिकता और यथार्थवाद के तत्व थे। सावरकर एक नास्तिक और एक कट्टर तर्कसंगत व्यक्ति थे जो सभी धर्मों में रूढ़िवादी विश्वासों का विरोध करते थे।

सावरकर का जन्म महाराष्ट्र में जिला नासिक के गांव भगूर में 28 मई, 1883 को हुआ था। छात्र जीवन में उन पर लोकमान्य तिलक के समाचार पत्र ‘केसरी’ का बहुत प्रभाव पड़ा। इन्होंने भी अपने जीवन का लक्ष्य देश की स्वतन्त्रता को बना लिया। 1905 में उन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आन्दोलन चलाया।

सावरकर सशस्त्र क्रान्ति के पक्षधर थे। उनकी इच्छा विदेश जाकर वहां से शस्त्र भारत भेजने की थी। अतः वह श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा दी जाने वाली छात्रवृत्ति लेकर ब्रिटेन चले गए। लन्दन का ‘इंडिया हाउस’ उनकी गतिविधियों का केन्द्र था। वहां रहने वाले अनेक छात्रों को उन्होंने क्रान्ति के लिए प्रेरित किया। कर्जन वायली को मारने वाले मदनलाल धींगरा उनमें से एक थे। उनकी गतिविधियां देखकर ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें 13 मार्च, 1910 को पकड़ लिया। उन पर भारत में भी अनेक मुकदमे चल रहे थे। अतः उन्हें मोरिया नामक जलयान से भारत लाया जाने लगा। 10 जुलाई, 1910 को जब वह फ्रान्स के मोर्सेल्स बन्दरगाह पर खड़ा था तो वह शौच के बहाने शौचालय में गए और वहां से समुद्र में कूदकर तैरते हुए तट पर पहुंच गए।

तट पर उन्होंने स्वयं को फ्रान्सीसी पुलिसकर्मी के हवाले कर दिया। उनका पीछा कर रहे अंग्रेज सैनिकों ने उन्हें फ्रान्सीसी पुलिस से ले लिया। यह अन्तर्राष्ट्रीय विधि के विपरीत था। इसलिए यह मुकदमा हेग के अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय तक पहुंचा जहां उन्हें अंग्रेज शासन के विरुद्ध षडयन्त्र रचने तथा शस्त्र भारत भेजने के अपराध में आजन्म कारावास की सजा सुनाई गई।

सावरकर ने ब्रिटिश अभिलेखागारों का गहन अध्ययन कर ‘1857 का स्वाधीनता संग्राम’ नामक महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी। फिर इसे गुप्त रूप से छपने के लिए भारत भेजा गया। ब्रिटिश शासन ने इसे छपने से पहले ही प्रतिबन्धित कर दिया गया।

प्रकाशक ने इसे गुप्त रूप से पेरिस भेजा। वहां भी ब्रिटिश गुप्तचर विभाग ने इसे छपने नहीं दिया। अन्ततः 1909 में हालैण्ड से यह प्रकाशित हुई। इस पुस्तक को 1857 के स्वाधीनता समर के विषद विवरण के लिए सर्वाधिक प्रामाणिक पुस्तक माना जाता है।

साल 1911 में उन्हें एक और आजन्म कारावास की सजा सुनाकर काला पानी भेज दिया गया। इस प्रकार उन्हें दो जन्मों का कारावास मिला। वहां इनके बड़े भाई गणेश सावरकर भी बन्द थे। जेल में इन पर घोर अत्याचार किए गए।

साल 1921 में उन्हें अंडमान से रत्नागिरी भेजा गया। 1937 में वह वहां से भी मुक्त कर दिए गए। तब वह सुभाष चन्द्र बोस के साथ मिलकर क्रान्ति की योजना में लग गए । 1947 में स्वतन्त्रता के बाद उनका गांधी हत्या के मुकदमे में नाम आया जिसमें उन्हें निर्दोष पाया गया। वह राजनीति के हिन्दूकरण तथा हिन्दुओं के सैनिकीकरण के प्रबल पक्षधर थे। स्वास्थ्य बहुत बिगड़ जाने पर वीर सावरकर ने प्रायोपवेशन द्वारा 26 फरवरी, 1966 को देह त्याग दी।

Last modified onWednesday, 11 July 2018 13:03
back to top

loading...
Bookmaker with best odds http://wbetting.co.uk review site.