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अंग्रेजों के खिलाफ सशस्‍त्र विद्रोह करने वाली पहली भारतीय शासक थी रानी चेन्‍नम्‍मा

कित्‍तूरु की महारानी, रानी चेन्‍नम्‍मा एक ऐसी योद्धा थीं जिन्‍होंने 19वीं सदी की शुरुआत में अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध का नेतृत्‍व किया था जब तमाम शासक अंग्रेजों की साजिशों से परिचित नहीं थे।इस तथ्‍य की जानकारी बहुत कम है कि अंग्रेजों के विरुद्ध ज्‍यादातर विद्रोह दक्षिण भारत में शुरू हुए। 18वीं सदी के अंत में मद्रास प्रेजीडेंसी में पुली थेवर और वीरापंडी कट्टाबोमन, पल्लियाकर (पॉलीगर), 1799 और 1801 के बीच विद्रोह करने वाले मरुडू पांडेयन भाई, 1806 की वेल्‍लोर गदर तथा 1792 से 1805 में केरल में कोट्टयम के पजास्सी राजा का विद्रोह 1857 की क्रां‍ति के पहले के कुछ उदाहरण हैं। सभी विद्रोहियों को फांसी देकर, सिर काटकर या तोपों से उड़ाकर निर्दयता से मार डाला गया था। लेकिन, इन सभी ने माफी मांगने और अंग्रेजों के अधीन रहने से इंकार कर दिया था। (Read in English)

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न झुका..., न रुका..., अमर शहीद महाराणा बख्तावर सिंह

अमर शहीद महाराणा बख्तावर सिंहमध्य प्रदेश के धार जिले के अमझेरा कस्बे के अमर शहीद महाराणा बख्तावर सिंह को मालवा क्षेत्र में विशेष रूप से नमन किया जाता है। मालवा की धरती पर प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों से मुकाबला करने वाले वह ऐसे नेतृत्वकर्ता थे जिन्होंने अंग्रेजों की सत्ता की नींव को कमजोर कर दिया था। उन्होंने राजशाही में जीने वाले लोगों को भी देश के लिए बलिदान देने की प्रेरणा दी। लंबे संघर्ष के बाद छलपूर्वक अंग्रेजों ने उन्हें कैद कर लिया। 10 फरवरी 1858 में इंदौर के महाराजा यशवंत चिकित्सालय परिसर के एक नीम के पेड़ पर उन्हें फांसी पर लटका दिया। 

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अखिल भारत के 'प्रथम नेता' थे सर सुरेंद्रनाथ बनर्जी

भारतीय सिविल सेवा के 1869 बैच का यह अधिकारी एक अनुभवी सिविल सेवक के रूप में उभर सकता था किंतु 1874 में कमज़ोर आधार पर सेवा से हटाए जाने के बाद सुरेंद्रनाथ बनर्जी  ने अपनी प्राथमिकताएं दोबारा तय कीं।भारतीय सिविल सेवा के 1869 बैच का यह अधिकारी एक अनुभवी सिविल सेवक के रूप में उभर सकता था किंतु 1874 में कमज़ोर आधार पर सेवा से हटाए जाने के बाद सुरेंद्रनाथ बनर्जी  ने अपनी प्राथमिकताएं दोबारा तय कीं। वह सार्वजनिक जीवन में आए।

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भारतीय गौरव और आत्‍मविश्‍वास के प्रतीक हैं चंद्रशेखर आजाद

विदेशी शासन की क्रूरता पर काबू पाने की आवश्‍यकता के साथ ही साथ हमारे उपमहाद्वीप के गरीब और असंगठित लोगों को इस संघर्ष के लिए तैयार करना भी उस समय के राष्‍ट्रीय नेताओं के समक्ष भयावह चुनौती थी।उपनिवेशी शासन के विरुद्ध भारत का संघर्ष लम्‍बा और कठिन था। विदेशी शासन की क्रूरता पर काबू पाने की आवश्‍यकता के साथ ही साथ हमारे उपमहाद्वीप के गरीब और असंगठित लोगों को इस संघर्ष के लिए तैयार करना भी उस समय के राष्‍ट्रीय नेताओं के समक्ष भयावह चुनौती थी। विदेशी प्रभुत्‍व के खिलाफ हमारे संघर्ष का सबसे महत्‍वपूर्ण पहलु लोगों को अज्ञानता से बाहर निकालने की हमारे नेताओं की योग्‍यता और इसके परिणामस्‍वरूप एक भारतीय राष्‍ट्र के विचार का पुनरुत्‍थान था।

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