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अहिंसा ही है जीवन का मुख्य आधार

अहिंसा ही है जीवन का मुख्य आधारअहिंसा जीवन की आधार भूमि है। अहिंसा के अभाव में त्राहि-त्राहि है और अहिंसा के सद्भाव में ही त्राण है। वस्तुत: व्यक्ति, परिवार, समाज, देश और राष्ट्र इसके अभाव में टिक ही नहीं सकते। इसलिए, सभी धर्मों ने इसे एक स्वर से स्वीकार किया है।

अहिंसा की महत्ता और उपयोगिता के संबंध में दो मत नहीं हो सकते भले ही उसकी सीमाएं भिन्न हों। कोई भी धर्म हिंसा को प्रोत्साहित नहीं कहता।

वैदिक धर्म में अहिंसा परमोधर्म के अटल सिद्धान्त को सम्मुख रखकर अहिंसा की विवेचना की गई है। महाभारत में कहा गया है कि अहिंसा ही सबसे बड़ा धर्म है। मनुस्मृति में कहा गया है कि जो कार्य तुम्हें पसंद नहीं, उसे दूसरों के लिए कभी मत करो।

तथागत बुद्ध ने कहा कि जो प्राणी हिंसा नहीं करता, उसी को आर्य कहा जाता है तो भगवान महावीर ने कहा कि समस्या का प्रतिकार सिर्फ तलवार नहीं बल्कि प्रेम और सद्भाव है। जैन धर्म का तो प्राण ही अहिंसा है। अहिंसा के बिना जैन धर्म का छोटे से छोटा साधक एक डग भी नहीं भर सकता। सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह आदि सभी व्रतों का समावेश अहिंसा में हो जाता है।

इस्लाम में मनुष्य से कहा गया है कि जगत के सारे प्राणी खुदा के बंदे हैं। इससे प्रमाणित होता है कि इस्लाम में भी अहिंसा को महत्व दिया गया। हालांकि, बाद में इसमें जो हिंसा का स्वर गूंजने लगा उसका प्रमुख कारण स्वार्थी और रसलोलुपी व्यक्ति ही हैँ। उन्होंने हिंसा का समावेश करके इस्लाम धर्म को बदनाम कर दिया।

ईसा ने भी धर्म प्रेम, करुणा और सेवा का पावन संदेश दिया तो यहूदी धर्म में कहा गया है किसी आदमी के आत्मसम्मान को चोट नहीं पहुंचाओ।

दूसरी तरफ, पारसी धर्म में कहा गया है कि दुश्मन से बदला मत लो और ताओ धर्म में कहा गया है कि जो तुम्हारे प्रति अच्छा व्यवहार करता है उसके प्रति भी अच्छा व्यवहार करो।

धर्मों के इस विश्लेषण से यह साफ हो जाता है कि विचारधारा कोई भी हो लेकिन अहिंसा को लेकर कोई मतभेद नहीं है।

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