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स्वयं का सत्य मिलने पर धर्म से परिचय संभव

स्वयं का सत्य मिलने पर धर्म से परिचय संभवधर्म के विस्तार एवं विविधता की खोज अनावश्यक है। यदि कुछ आवश्यक है तो वह है धर्म के तत्व की खोज, इसकी अनेकता में एकता की खोज और इसके परम सार की खोज।

धर्म के तत्व की खोज तो खुद की खोज में पूरी होती हैं। स्वयं का सत्य मिलने पर धर्म अपने आप ही मिल जाता है। यह तत्व शास्त्रों में नहीं हैं। शास्त्रों में जो है, वह तो केवल संकेत मात्र है।

धर्म का तत्व इन संप्रदायों में भी नहीं है। संप्रदाय तो विभिन्न उपासना पद्धतियों पर टिके संगठन हैं। ये सुव्यवस्थित रीति से अपने मत का प्रचार करते हैं। धर्म का तत्व तो निज की अत्यंत निजता में है। उसके लिए स्वयं के बाहर नहीं बल्कि भीतर चलना आवश्यक है।

धर्म का तत्व तो स्वयं की श्वास में है। बस हमारे पास उसे देखने और समझने की दृष्टि नहीं है। धर्म का तत्व स्वयं के रक्त की प्रत्येक बूंद में हैं, बस उसे खोजने का साहस और संकल्प  नहीं हैं। धर्म का तत्व तो सूर्य की भांति स्पष्ट है लेकिन उसे देखने के लिए आंख खोलने की हिम्मत तो जुटानी ही होगी।

धर्म का यही तत्व तो अपना सच्चा जीवन है लेकिन इसकी अनुभूति तभी हो सकेगी, जब यह देह की कब्रों से बाहर निकल सकेगा। दैहिक आसक्ति एवं भोग के आकर्षण से छुटकारा पा सकेगा।

यह परम सत्य है कि धर्म की यथार्थता जड़ता में नहीं बल्कि चैतन्यता में है। इसलिए सो मत जाओ बल्कि जागो और चलो। परंतु, चलने की दिशा बाहर की और नही, अंदर की और होनी चाहिए। अंतर्गमन ही धर्म के तत्व को खोजने और पाने का राजमार्ग है।

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