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कहीं काल न बन जाए काला दमा

कहीं काल न बन जाए काला दमा

कहीं काल न बन जाए काला दमाकाला दमा के मरीजों के लिए सर्दी कई तरह की मुश्किलें लेकर आती है। डॉक्टरों का कहना है कि इस बीमारी से पीड़ित अधिकांश मरीजों को सालभर उतनी दिक्कत नहीं होती जितनी सिर्फ जाड़े के दिनों में होती हैं। जाड़ों के चार महीने यानी नवंबर, दिसंबर, जनवरी और फरवरी, काला दमा के मरीजों के लिए बेहद कष्टकारक होते हैं। इस दौरान अस्पतालों में इस बीमारी से पीड़ित मरीजों की संख्या 30 फीसदी तक बढ़ जाती है।

काला दमा फेंफड़ों की एक गंभीर बीमारी है। इसमें सांस की नलियां सिकुड़ जाती हैं। सूजन के लगातार  बढ़ने से फेंफड़े छलनी हो जाते हैं। यह बीमारी सांस में रुकावट से शुरू होती है और धीरे-धीरे सांस लेने में मुश्किल होने लगती है। यह अस्थमा के दमा से अलग होता है। यहां हम आपको बता रहे हैं इससे जुड़े सात अहम तथ्य।

1. बीड़ी और सिगरेट या किसी भी अन्य प्रकार का धूम्रपान करने वाले लोगों में काला दमा का खतरा कई गुना ज्यादा बढ़ जाता है

2. घरों में अंगीठी,हीटर,गीजर इत्यादि के प्रदूषण से भी यह बीमारी हो सकती है।

3. करीब आठ करोड़ से ज्यादा लोग दुनियाभर में मध्यम से गंभीर स्तर के काला दमा से पीड़ित हैं।

4. जाड़े के दिनों में काला दमा के मरीजों की संख्या30फीसदी तक बढ़ जाती है।

5. काला दमा के मरीजों को हफ्ते में तीन से चार बार45मिनट के लिए व्यायाम जरूरी है। कसरत के दौरान ऑक्सीजन की मात्रा भी जांचनी चाहिए।

6. काला दमा दुनिया में मौत का चौथा और अपने देश में दूसरा आम कारण है।

7. ग्रामीण आंचलों तक फैली इस बीमारी की महिलाएं ज्यादा शिकार हैं

 

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